मुझे परिवार से निकाला गया, मुझे मारा-अपमानित किया गया’
मुझे परिवार से निकाला गया, मुझे मारा-अपमानित किया गया’
अगले ही सुबह, रोहिणी ने सोशल मीडिया पर एक लंबा पोस्ट साझा किया, जिसमें उन्होंने परिवार और पार्टी पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने लिखा, “मैंने आज फैसला लिया है कि मैं राजनीति छोड़ रही हूं और अपने परिवार से भी नाता तोड़ रही हूं।” लेकिन यह सिर्फ घोषणा नहीं थी—यह एक खुला पत्र था, जो तेजस्वी यादव के करीबी सलाहकारों संजय यादव और रमीज पर केंद्रित था। रोहिणी ने दावा किया कि चुनावी हार के पीछे इन दोनों की साजिश है। “संजय और रमीज ने पार्टी को अपने कब्जे में ले लिया था। चुनाव प्रबंधन से लेकर सोशल मीडिया तक, सब कुछ उनके इशारों पर चल रहा था। सवाल पूछो तो गालियां मिलेंगी, नाम लो तो चप्पल से मारेंगे,” रोहिणी ने लिखा।
उन्होंने यह भी कहा कि हार के बाद जब उन्होंने इन दोनों से जवाब मांगा, तो उन्हें घर से निकाल दिया गया और अपमानित किया गया। “मुझे पीटा गया, घर से बाहर फेंक दिया गया। तेजस्वी चाणक्य बनने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन असल में ये लोग पार्टी को बर्बाद कर रहे हैं,” रोहिणी का आरोप था।
इस घटना ने लालू परिवार के आंतरिक कलह को सतह पर ला दिया। संजय यादव, जो तेजस्वी के पुराने सहयोगी हैं, पर पहले से ही कई विवादास्पद मामले दर्ज हैं। वहीं, रमीज—जो उत्तर प्रदेश के बलरामपुर से हैं और जेल में बंद पूर्व सांसद रिजवान जहीर के दामाद—आरजेडी के सोशल मीडिया और चुनावी रणनीति का प्रमुख प्रबंधक रहे हैं। रोहिणी ने इन्हें “परिवार के दुश्मन” करार दिया, दावा करते हुए कि इनकी वजह से पार्टी की छवि खराब हुई।
परिवार के इस संकट पर लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी की ओर से अब तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। तेजस्वी यादव ने भी चुप्पी साध रखी है, लेकिन आरजेडी के कुछ नेताओं ने रोहिणी के बयान को “भावुक प्रतिक्रिया” बताकर टालने की कोशिश की। बीजेपी ने इस मौके को लपक लिया। पार्टी के प्रवक्ताओं ने कहा कि “लालू परिवार का अंतिम संस्कार खुद ही हो रहा है। यह आरजेडी की आंतरिक कमजोरी का प्रमाण है।”
रोहिणी आचार्य का राजनीतिक सफर छोटा लेकिन चर्चित रहा। 2020 के चुनावों में उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए आरजेडी की पैरवी की थी और खुद को पार्टी की भावी नेता के रूप में पेश किया था। लेकिन अब, 30 साल की उम्र में ही, वह सब पीछे छोड़ रही हैं। सवाल यह है कि क्या यह परिवार का स्थायी विभाजन है, या चुनावी हार का अस्थायी सदमा? बिहार की राजनीति में लालू परिवार की यह दरार कितनी गहरी है, इसका जवाब आने वाले दिनों में मिलेगा। फिलहाल, पटना की सड़कों पर सियासी बहस का ‘यादव परिवार’ अब टूट चुका है?
रोहिणी आचार्य इन दिनों देश और बिहार की राजनीति में सबसे चर्चा में हैं। एक तरफ राजनीति की सबसे बड़ी विरासत—लालू परिवार—का पतन, दूसरी ओर परिवार के आंतरिक चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) की ऐतिहासिक हार के अगले ही दिन लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने राजनीति छोड़ने और अपने परिवार से नाता तोड़ने निर्णय नहीं, बल्कि बिहार की सामाजिक-राजनीतिक संरचना और बड़े नेताओं के परिवारों में भीतर पक रही जंग का आईना है
‘मुझे परिवार से निकाला गया, मुझे मारा-अपमानित किया गया’
रोहिणी का अचानक यह फैसला रातों-रात नहीं बना। उनका आरोप है कि तेजस्वी यादव, संजय यादव, और रमीज जैसे करीबी सहयोगियों ने उन्हें न केवल साइडलाइन किया, बल्कि चुनावी हार पर सवाल उठाने पर उनके साथ गाली-गलौज और मारपीट तक की गई। मीडिया से बात करते हुए रोहिणी आचार्य ने कहा—“मैं अब अकेली हूँ, मेरा कोई परिवार नहीं. तेजस्वी यादव, संजय यादव और रमीज से पूछिए, यही लोग मुझे घर से बाहर निकाले हैं।”
यह आरोप परिवार की आपसी दरार और आरजेडी के भीतर चल रहे ‘इनर सर्कल’ संघर्ष को भी सामने लाता है। रोहिणी ने साफ कहा कि संजय यादव और रमीज पर सवाल उठाओ तो “घर से निकाल दिया जाता है, जलील किया जाता है”—यह उस सत्ता संघर्ष की झलक है जहाँ न नेताओं के परिवार सुरक्षित हैं, न ही पार्टी कार्यकर्त्ता
मैंने तो सब कुछ दे दिया, बदले में क्या मिला?’
रोहिणी की भावनाएँ सिर्फ गुस्से या नाराजगी तक सीमित नहीं हैं। ये गहरी निराशा और अपने परिवार से मिली उपेक्षा का नतीजा हैं। यह वही रोहिणी हैं, जिन्होंने 2022 में लालू यादव की जान बचाने के लिए अपनी किडनी तक दान कर दी थी। लेकिन बेटियों के लिए सियासी घराने में अपनी जगह पक्की करना कितना मुश्किल है—यह घटनाक्रम उसी दर्द को उजागर करता है
इन घटनाओं की जड़ में है परिवार के भीतर सत्ता का केंद्रीकरण और नए नेताओं की शक्तिशाली लॉबी। संजय यादव और रमीज—तेजस्वी के करीबी—पार्टी और परिवार में रणनीतिक ताकत हासिल कर चुके हैं। रोहिणी जैसे ‘आउटसाइडर’ को न तो सवाल पूछने की आज़ादी है और न ही कोई राजनीतिक रोल
‘हर गलती का दोषी मैं हूँ’
चुनाव में आरजेडी की करारी हार के ठीक बाद रोहिणी के सोशल मीडिया पोस्ट ने सबको चौंका दिया। उन्होंने लिखा—“मैं राजनीति छोड़ रही हूँ और परिवार से नाता तोड़ रही हूँ. ये वही है जो संजय यादव और रमीज ने मुझसे कहा…और अब हर गलती का दोषी मैं हूँ।” यानी अपनी सार्वजनिक बदनामी, फैसले की जिम्मेदारी भी वे अकेले अपने सिर ले रही हैं
उनके इस बयान से यह भी संकेत मिलता है कि हार का दोष पार्टी में किसके सिर फोड़ा जाए—इस पर अंदरूनी खींचतान काफी तेज है। तेजस्वी यादव खुद मुख्यमंत्री चेहरा थे; संजय यादव और रमीज की भूमिका को लेकर पार्टी के भीतर काफी असंतोष है। लेकिन परिवार के भीतर कोई विरोध या सवाल नहीं सुनना चाहता, और इसका खामियाजा रोहिणी को भुगतना पड़ा
पार्टी की शर्मनाक हार और सार्वजनिक झगड़े का असर
सिर्फ परिवार की निजी तकलीफ नहीं, यह घटना आरजेडी के संगठन, कार्यकर्ता, और आम समर्थकों के लिए भी बड़ी मायूसी लेकर आई। 2020 में जहां 75 सीटें थीं, इस चुनाव में पार्टी सिर्फ 25 पर सिमट गई। जनाधार खिसकना, जनता के सवालों से डर, और परिवार में कलह—इन सबने पार्टी की छवि को गहरा नुकसान पहुँचाया है।
तेज प्रताप यादव की पूर्व में पार्टी से निकासी, तेजस्वी का ताकतवर गुट, और अब रोहिणी की विदाई—यह एक ‘डिस्फंक्शनल’ लालू परिवार का नया अध्याय है। यही कारण है कि मीडिया और विपक्ष दोनों ने सवाल उठाना शुरू कर दिया कि क्या अब लालू परिवार का राजनीतिक वर्चस्व अपने अंतिम चरण में है?
राजनीति के पावर-गेम में महिलाओं की स्थिति और ‘इनर सर्कल’ की राजनीति
रोहिणी एक डॉक्टर रही हैं, सिंगापुर में अपने पति के साथ रहती हैं, और 2024 लोकसभा चुनाव में सिवान सीट से आरजेडी के प्रत्याशी भी रहीं। लेकिन राजनीति के दाव-पेच और परिवार के अंदरूनी महाभारत में उनका अस्तित्व सिमट गया। अक्सर बड़े घराने राजनीति में बेटियों को ‘पोस्टर गर्ल’ या भावनात्मक चेहरा बनाकर छोड़ देते हैं—रियल पावर ‘इनर सर्कल’ के पुरुषों के हाथ में रहती है
पार्टी के कई कार्यकर्ताओं ने रोहिणी पर चुनावी हार का दोष मढ़ने की कोशिश की, विशेष कर जब उन्होंने परिवार के मतभेदों को सार्वजनिक किया। वहीं तेजस्वी का खेमा, संजय यादव और रमीज की भूमिका को सबसे मजबूत मानता है। संजय यादव, जिन्हें ‘चाणक्य’ कहा जाता है, तेजस्वी के लिए रणनीतिकार की भूमिका में हैं, वहीं रमीज को यूपी की राजनीति से जुड़े होने के बावजूद खासतौर पर तेजस्वी के इनर सर्कल में जगह मिली
मीडिया, विरोधी और समाज की नजर में
इस पूरे घटनाक्रम ने बिहार की राजनीति में हलचल मचा दी है। भाजपा और विरोधी दलों ने इसे लालू परिवार की ‘संकट काल’ की निशानी बताते हुए कहा कि अगर ऐसे ही घर परिवार बिखरेंगे, तो राज्य के नेतृत्व की जिम्मेदारी कौन संभालेगा? वहीं समर्थकों का एक बड़ा वर्ग रोहिणी के दर्द में खुद को भी शामिल महसूस कर रहा है, खासकर महिलाओं और युवाओं के बीच
निष्कर्ष
रोहिणी आचार्य की कहानी लालू परिवार के सिर्फ एक सदस्य की पीड़ा नहीं, बल्कि उस पूरे पावर स्ट्रक्चर और राजनीति का आईना है जिसमें पुरुष और ताकतवर गुटों के सामने महिलाएँ, भले वे कितनी ही पढ़ी-लिखी और सक्षम क्यों न हों, आसानी से बलि का बकरा बन जाती हैं। यह घटना न सिर्फ एक परिवार की निजी दरार है, बल्कि पूरे बिहार की राजनीति और समाज के लिए भी एक बड़ा संदेश है—पारदर्शिता, लोकतांत्रिक संवाद, और परिवार-वादी सत्ता के सहारे अब राजनीति की नाव पार नहीं होने वाली।

